Mutterings

I have been writing in hindi quiet a lot lately, it has this uplifting effect just like it is with our mother tongue. What makes this one necessary to be pressed is its simplicity and dreaminess, so much attached with it.

 

 

मस्त चले हँसो में दो पंख मेरे भी
बेताबी की झील को आकाश से चूमता
कल्पनाओं की स्वर्णिम धूल उड़ाता
उस पागल हँस की चाल को किसने समझा
नम हुई आँखों का सुख जाना किसने देखा
क़ैद होना ना हो जाने सा है
इस शोर में एक आवाज़ मेरी भी
गुम हो जाना चाहू तो पागल हु
बेपरवाह पगलमन मेरा यू आज सामने है

मन की निभृत्तम गहराईयो में देखो चला एक रास है
जागते जागते सवेरा होने सा आभास है
माया में लिप्त ये स्वयं से दर्शन है
बाक़ी सब प्यास है
बाक़ी सब प्यास है।

इतना कह दिया तो पागल है
कोई कह दे! ये पड़ने वाला पागल है
लेकिन इच्छुक सिर्फ़ नादान है
ये मन नादान है
नहीं समझता की वर्तमान की भव्यता ही समाधान है ।

बाज़ारू दुनिया में लो!
अब आवाज़ एक मेरी भी
प्रॉपगैंडा की एक दुकान लो मेरी भी

हंस चला देखो हंस उड़ा
हंस चला देखो हंस उड़ा

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s