Scribblings

मेरा मन है तेरा मन

मैं उन गहराइयों में उतर आया हूँ, जहाँ पूँछ ना रवि कि है।
वसुंधरा का ताप सहज ही समेटे, मन एक सागर सा है ।
दर्पण है, स्वयं के संदर्भ में परम के दर्शन हैं।
क्या ये मेरा मन है, या ये तेरा मन है ।
कवि हतोत्साहित है विश्व की रुचि-शुचि से ।
क्या सुंदरता का श्वेत ही रंग है ?
क्या महानता का एक ही आकार है ?
मन के घर्शन-आकर्षण के बीच का ये मंथन ही तो जीवन है ।
इस में ना मैं देव हूँ ना दैत्य हूँ ।
कूर्म हूँ, चतुर्गति हूँ संतुलन मात्र के लिए, सृष्टि के विचार मात्र के लिए ।
ना ये मेरा मन है ना ये तेरा मन है ।
किंतु कवि तो सरल हृदय है, इस दुनिया को नहीं पूछता,
कवि के लिए सिर्फ़ मंच ही अनंत है, जानता है ।
माया से ही तो उत्पन्न ये प्रपंच है ।
ये मैं किन गहराइयों में उतर आया हूँ ?
क्या ये तेरा मन है, क्या ये मेरा मन है ।
ये मैं किन गहराइयों में उतर आया हूँ ?
ये मैं किन गहराइयों में उतर आया हूँ

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